कार्तिक माह में गंगा स्नान और दीपदान का होता है खास महत्व

गढ़मुक्तेश्वर। हिंदू पंचांग में कार्तिक मास को वर्ष का सबसे शुभ और पुण्यदायी महीना माना गया है। यह वह काल है जब साधना, स्नान, दान और दीपदान के माध्यम से व्यक्ति आत्मशुद्धि प्राप्त कर सकता है। धर्मग्रंथों में इसे भगवान विष्णु का प्रिय महीना बताया गया है। ब्रह्माजी ने नारदजी से कहा था “न कार्तिकसमो मासो न कृतेन समं युगं, न वेदं सदृशं शास्त्रं न तीर्थं गंगया समं।” अर्थात कार्तिक मास के समान कोई महीना नहीं, सतयुग के समान कोई युग नहीं, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं और गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं। इस मास में किए गए सभी शुभ कार्य स्नान, दान, व्रत और दीपदान देवताओं द्वारा स्वयं स्वीकार किए जाते हैं।
कार्तिक स्नान से मिलती है आत्मशुद्धि
शास्त्रों के अनुसार कार्तिक मास में ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करना अत्यंत पुण्यकारी होता है। गंगा, यमुना, सरस्वती या अन्य पवित्र नदियों में स्नान करने से समस्त पापों का क्षय होता है। यदि तीर्थस्नान संभव न हो, तो घर में ही गंगाजल मिलाकर स्नान करने का विधान है। यह न केवल शरीर की, बल्कि मन की शुद्धि का भी माध्यम बनता है और साधक को आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करता है।
दीपदान का होता है खास महत्व
कार्तिक मास में दीपदान का विशेष महत्व बताया गया है। संध्या के समय घर के मुख्य द्वार, तुलसी के पौधे और मंदिरों में दीप जलाने से अज्ञान का अंधकार मिटता है और ज्ञान का प्रकाश फैलता है। दीपदान को लक्ष्मी प्राप्ति और सुख-समृद्धि का प्रतीक माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, इस मास में जलाया गया एक दीप सहस्र दीपों के बराबर फल देता है।
सात्विक आहार और संयम का महत्व
कार्तिक मास के दौरान सात्विक आहार और संयम को अत्यंत आवश्यक माना गया है। इस समय प्याज, लहसुन, मांस और मद्यपान का पूर्ण त्याग कर फल, दूध और सादा आहार लेने का विधान है। मन, वचन और कर्म की शुद्धता बनाए रखने से व्यक्ति का आत्मिक विकास होता है। इस महीने में मौन व्रत, ध्यान और सत्संग करने से मनोबल और मानसिक शांति बढ़ती है।







